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मंज़िल

Updated: Nov 23, 2025

ज़िंदा हूँ, जब एहसास हुआ,

और समझा ज़िंदगी एक राह है,

तो ठान चला इस राह पर,

अपनी मंज़िल की तलाश में,

ख़ामोश था, पर जोश था ।


कई मोड़ आये राह में,

ठोकरें भी मिली कई,

गिरा, उठा और चलता गया,

खामोश था, मदहोश था ।


रास्ते में खुशनुमा नज़ारे भी दिखे कई,

देखी बर्फीली हसीन वादियां,

और देखे फूल, जिन पे ओस था,

 बस लगा फिरदौस था ।


पर ठोकरें न रोक पायी मुझे,

ना भटका किसी हंसीन नज़ारे से,

रुका नहीं , डगमगाता चला,

मंज़िल पहुंचने का जोश था ।


देखा अनदेखा कर दिया,

मंज़िल पहुँचने की चाह में,

और मैं चलता गया,

शायद मैं ही बदहोश था ।


जब चलते चलते थक गया,

और साँसें थमने लगीं,

राज़ तूने समझाया मुझे,

मंज़िल नहीं, रास्ता कोष था ।


फिर जब साँसें रुकी,

तब भी खामोश था ,

पर चेहरे पे मुस्कान थी,

और अब बस संतोष था ।

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