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मंज़िल
ज़िंदा हूँ, जब एहसास हुआ, और समझा ज़िंदगी एक राह है, तो ठान चला इस राह पर, अपनी मंज़िल की तलाश में, ख़ामोश था, पर जोश था । कई मोड़ आये राह में, ठोकरें भी मिली कई, गिरा, उठा और चलता गया, खामोश था, मदहोश था । रास्ते में खुशनुमा नज़ारे भी दिखे कई, देखी बर्फीली हसीन वादियां, और देखे फूल, जिन पे ओस था, बस लगा फिरदौस था । पर ठोकरें न रोक पायी मुझे, ना भटका किसी हंसीन नज़ारे से, रुका नहीं , डगमगाता चला, मंज़िल पहुंचने का जोश था । देखा अनदेखा कर दिया, मंज़िल पहुँचने की चाह में, और मैं चल
Feb 4, 20211 min read
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